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भगवत गीता के छठे अध्याय (षष्ठोध्याय) के श्लोक \(6.5\) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “अपने मन से अपना उत्थान करो, अपने आप को नीचा मत गिराओ।” यह श्लोक कहता है कि व्यक्ति को अपनी बुद्धि और मन का उपयोग करके अपना उद्धार करना चाहिए। श्लोक की व्याख्या: इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य अपने ही मन से खुद का उत्थान कर सकता है। अपना उद्धार करने के लिए, हमें खुद को नीचा नहीं दिखाना चाहिए, बल्कि अपनी आत्मा को ऊपर उठाना चाहिए।
इससे यह साफ होता है कि जब हम संसार को सत्य जानकर उसके राग द्वेष में लग जाते हैं तो हमारे चक्र असंतुलित हो जाते हैं और हमें स्वयं ही नहीं मालूम चला कि सारे दुख के स्वयं ही जिम्मेदार हैं और हमें स्वयं ही इसे दूर करना होगा थोड़े से संकल्प के साथ यह चक्र बैलेंस हो जाते हैं और हम आत्म केंद्रित होकर के संतुलित चक्र से एक आनंद मय जीवन बिता पाते
मूलाधार चक्र के संतुलन के लिए किए जाने वाले योगासन और प्राणायाम
नाड़ी शोधन (वैकल्पिक नासिका श्वास): यह श्वास तकनीक मन को शांत करने और ऊर्जा को स्थिर करने में मदद करती है।
उज्जायी प्राणायाम (महासागरीय श्वास): यह शांत और केंद्रित वातावरण बनाता है और मूलाधार चक्र के लिए फायदेमंद है।
योगासन
बालासन (बाल मुद्रा): यह एक सहायक और स्थिर आसन है जो मूलाधार चक्र को शांत करने में मदद करता है।
मालासन (माला मुद्रा): इस आसन में जांघों को फैलाकर और पीठ के निचले हिस्से को आराम देकर स्थिरता प्राप्त की जाती है।
ताड़ासन (पर्वत मुद्रा): यह आसन स्थिरता लाता है, पैरों को जमीन से जोड़ता है और वर्तमान क्षण में स्थापित करता है।
शलभासन (टिड्डी मुद्रा): यह पेट के बल किया जाने वाला आसन है जो पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करता है और आपको पृथ्वी से जोड़ता है।
पश्चिमोत्तानासन: यह आसन पीठ के निचले हिस्से को फैलाता है और शांति की भावना को बढ़ावा देता है।
उत्कटासन (कुर्सी मुद्रा): यह संतुलन और स्थिरता को बढ़ावा देता है।
Iवीरभद्रासनI (योद्धा II): यह आसन शरीर में शक्ति और स्थिरता लाता है।
अंजनेयासन (लो लूंज पोज़): यह आसन जांघों और कूल्हों के लिए फायदेमंद है।
स्वाधिष्ठान चक्र को संतुलित करने के लिए योगासन
ये आसन कूल्हों और पेल्विक क्षेत्र को खोलने और ऊर्जा के प्रवाह को बेहतर बनाने में मदद करते हैं:
1-बद्ध कोणासन (Baddha Konasana): तितली आसन, जो जांघों और कूल्हों को फैलाता है।
2-उपविष्ट कोणासन (Upavistha Konasana): पैरों को फैलाकर आगे झुकने वाला आसन, जो कूल्हों को खोलता है।
3-अर्ध मत्स्येन्द्रासन (Ardha Matsyendrasana): आधा मत्स्येंद्र आसन, रीढ़ की हड्डी में लचीलापन लाता है और पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है।
4-सुप्त बद्ध कोणासन (Supta Baddha Konasana): लेटे हुए तितली आसन, जो विश्राम और तनावमुक्ति में सहायक है।
5-गोमुखासन (Gomukhasana): यह आसन कूल्हों और कंधों के तनाव को दूर करता है।
6-बालासन (Balasana): शिशु मुद्रा, जो मन को शांत करने और आराम देने में मदद करती है।
7-वीरभद्रासन II (Virabhadrasana II): योद्धा मुद्रा II, जो शक्ति और स्थिरता प्रदान करती है।
स्वाधिष्ठान चक्र को संतुलित करने के लिए प्राणायाम
श्वास तकनीकें इस चक्र को सक्रिय करने और भावनात्मक संतुलन लाने में महत्वपूर्ण हैं:
नाड़ी शोधन प्राणायाम (Nadi Shodhana): यह अनुलोम-विलोम के रूप में भी जाना जाता है, जो शरीर और मन के बीच संतुलन बनाता है।
उज्जयी प्राणायाम (Ujjayi): इस प्राणायाम में गले से हल्की ध्वनि के साथ सांस ली जाती है, जो मन को शांत करने में सहायक है।
कपालभाति (Kapalabhati): यह एक शुद्धिकरण क्रिया है, जो ऊर्जा के अवरोधों को दूर करती है।
चंद्र भेदन प्राणायाम (Chandra Bhedana): बाईं नासिका से श्वास लेना, जो मन को शांत और भावनात्मक रूप से स्थिर करता है।
इन आसनों और प्राणायाम का नियमित अभ्यास स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय और संतुलित करने में मदद करता है, जिससे रचनात्मकता, भावनात्मक संतुलन और समग्र कल्याण में
मणिपुर चक्र को संतुलित करने के लिए किए जाने वाले योगासन और प्राणायाम
धनुरासन (Bow Pose): यह पेट की मांसपेशियों को मजबूत करता है और मणिपुर चक्र में ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाता है।
भुजंगासन ( Cobra Pose): यह रीढ़ को लचीला बनाता है और ऊर्जा को चक्र में प्रवाहित करने में मदद करता है।
नवासन (Boat Pose): यह कोर की मांसपेशियों को मजबूत करता है और अग्नि तत्व से संबंधित है।
पश्चिमोत्तानासन (Seated Forward Bend): यह पाचन में मदद करता है और पेट के क्षेत्र में ऊर्जा प्रवाहित करता है।
उष्ट्रासन (Camel Pose): यह एक बैकबेंड है जो पेट के सामने के हिस्से को खोलता है और पाचन अग्नि को उत्तेजित करता है।
प्राणायाम
कपालभाति (Skull Shining Breath): यह एक विस्फोटक श्वास व्यायाम है जो उदर क्षेत्र को उत्तेजित करता है, विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है और चक्र को सक्रिय करता है।
डायाफ्रामिक श्वास (Diaphragmatic Breathing): गहरी, धीमी श्वास आपके पेट पर ध्यान केंद्रित करती है, जो सौर जाल चक्र को सक्रिय करने और मन को स्थिर करने में मदद करती है।
उड्डीयान बंध: यह एक शक्तिशाली अभ्यास है जो पेट क्षेत्र की ऊर्जा को केंद्रित करने में मदद करता है।
अतिरिक्त सुझाव
अभ्यास के लिए वज्रासन में भोजन के बाद बैठना पाचन को संतुलित करने में मदद कर सकता है।
योग के अभ्यास के दौरान रम (Ram) बीज मंत्र का जाप या नाभि के चारों ओर लाल त्रिभुज की कल्पना करना प्रभावी हो सकता है।
अपने अभ्यास को शांत और ध्यानपूर्ण बनाए रखने के लिए, अभ्यास से कम से कम दो-तीन घंटे पहले कुछ भी न खाएं।.
अनहद चक्र को संतुलित करने के लिए किए जाने वाले योगासन और प्राणायाम
भुजंगासन के साथ साँस लेना और छोड़ना: साँस लेते समय हृदय चक्र में ऊर्जा को महसूस करें और साँस छोड़ते समय तनाव और नकारात्मक भावनाओं को बाहर निकालें।
सुप्त वज्रासन: पीठ के बल लेटकर यह आसन छाती को खोलता है और हृदय चक्र को सक्रिय करता है।
श्वास-केंद्रित ध्यान: ध्यान करते समय, हृदय चक्र में हरी रोशनी की कल्पना करें और “यम” बीज मंत्र का जाप करें।
Note- All type of bhstrika pranayam is very helpfull in opening of Anahata chakra
योगासन
भुजंगासन (कोबरा पोज़): पेट के बल लेटकर छाती को ऊपर उठाएं और पीठ को मोड़ें। यह छाती को खोलता है और हृदय चक्र को सक्रिय करता है।
सेतु बंध सर्वांगासन (ब्रिज पोज़): पीठ के बल लेटकर, घुटनों को मोड़ें और कूल्हों को ऊपर उठाएं। इससे छाती खुलती है और कंधों में खिंचाव आता है।
उष्ट्रासन (कैमल पोज़): घुटनों के बल बैठकर, पीछे की ओर झुकें और अपने हाथों से पैरों को पकड़ें। यह छाती और हृदय को खोलता है।
गोमुखासन (काउ फेस पोज़): यह आसन हृदय और कंधों को खोलने में मदद करता है।
धनुरासन: पेट के बल लेटकर, टांगों को पीछे की ओर पकड़ें और छाती को ऊपर उठाएं।
जब यह संतुलित होता है तो व्यक्ति की आवाज़ में सत्य, मधुरता और आत्मविश्वास झलकता है। असंतुलन होने 🌿 विशुद्ध चक्र को संतुलित करने वाले योगासन
पर या तो व्यक्ति बहुत बोलने लगता है या भीतर की सच्चाई दब जाती है
1. सिंहासन (Simhasana – Lion Pose)**
* गले और जबड़े की जकड़न खोलता है, वाणी में स्पष्टता लाता है।
*क्रिया:जीभ बाहर निकालें, आंखें खोलें, “हा” की आवाज़ निकालें।
*भाव:अपने भीतर के डर को निकालते हुए आत्म-अभिव्यक्ति को मुक्त करें।
2. मत्स्यासन (Matsyasana – Fish Pose)**
* गले को खींचता है और थायरॉयड ग्रंथि को सक्रिय करता है।
भाव: हृदय और कंठ के बीच ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करता है।
3.भुजंगासन (Bhujangasana – Cobra Pose)**
* रीढ़ को लचीला बनाता है, गले और छाती के क्षेत्र को खोलता है।
भाव:“मैं अपने सत्य को स्वीकार करता हूँ” का संकल्प लें।
4. *उष्ट्रासन (Ustrasana – Camel Pose)*
* गले को पीछे की ओर खोलने से विशुद्ध चक्र में ऊर्जा प्रवाहित होती है।
भाव:आत्मविश्वास और आत्म-स्वीकृति को जगाने वाला आसन।
5. **हलासन (Halasana – Plough Pose)
थायरॉयड ग्रंथि और गर्दन के भाग को संतुलित करता है।
भाव:गहन शांति और भीतर की सुनने की शक्ति को बढ़ाता है।विशुद्ध चक्र को संतुलित करने वाले प्राणायाम
1.उज्जायी प्राणायाम (Ujjayi Breath)
* गले में हल्की आवाज़ के साथ की जाने वाली श्वास।
लाभ:कंठ क्षेत्र को सक्रिय करता है, मन को शीतल बनाता है।
*भाव:मेरी वाणी सत्य और मधुर है।”
2.भ्रामरी प्राणायाम (Bhramari – Bee Breath)**
भौंरे जैसी गूंज उत्पन्न करें।
लाभ गले और मन दोनों को शांत करता है, आत्म-संवाद को बढ़ाता है।
भाव:“मैं अपने भीतर की ध्वनि सुनता हूँ।”
3.नाड़ी शोधन (Anulom Vilom)**
* शरीर की ऊर्जा नाड़ियों को शुद्ध करता है।
*लाभ: सभी चक्रों को संतुलित करता है, जिसमें विशुद्ध भी शामिल है।
* भाव: “मैं संतुलित हूँ, शांत हूँ।”
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हर श्वास के साथ “हं” का जप करें, नीले प्रकाश की कल्पना करें जो गले से फैल रहा है।
सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra)* यानी *सातवाँ और सर्वोच्च चक्र, जो **सिर के शीर्ष (crown)* पर स्थित होता है, *चेतना, अध्यात्मिकता और ईश्वर से जुड़ाव* का प्रती
🌼 सहस्रार चक्र को संतुलित करने वाले योगासन
1. *शीर्षासन (Sirsasana – Headstand)*
* सहस्रार चक्र को सीधा सक्रिय करने वाला आसन।
* *लाभ:* रक्त प्रवाह को सिर की ओर बढ़ाता है, मानसिक स्पष्टता लाता है।
* *ध्यान:* श्वास स्थिर रखें और सिर के शीर्ष पर उज्ज्वल प्रकाश का अनुभव करें।
* *नोट:* इसे केवल अभ्यासियों के लिए, दीवार का सहारा लेकर करें। 2. *पद्मासन (Padmasana – Lotus Pose)*
* ध्यान के लिए सर्वोत्तम मुद्रा, जिसमें सहस्रार चक्र खुलता है।
* *भाव:* “मैं दिव्य चेतना से जुड़ा हूँ।”
* *ध्यान:* सिर के ऊपर सफेद प्रकाश की कल्पना करें जो ऊपर से उतरकर शरीर में फैल रहा है।
3. *सुखासन (Sukhasana – Easy Pose)*
* शुरुआती साधकों के लिए उपयुक्त।
* *लाभ:* शरीर को स्थिर बनाता है, ध्यान को भीतर की ओर लाता है।
* *भाव:* “मेरा मन शांत और स्थिर है।”
* 4. *बालासन (Balasana – Child’s Pose)*
* अहंकार को पिघलाता है, समर्पण और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
* *भाव:* “मैं समर्पित हूँ, मैं सुरक्षित हूँ।
5. *ताड़ासन (Tadasana – Mountain Pose)*
* ऊर्जा को पृथ्वी से ऊपर सहस्रार तक प्रवाहित करता है।
* *भाव:* “मैं आकाश और धरती का सेतु हूँ।”
सहस्रा र चक्र को संतुलित करने वाले प्राणायाम
1. *नाड़ी शोधन प्राणायाम (Anulom Vilom)*
* सबसे प्रभावशाली प्राणायाम जो पूरे ऊर्जा तंत्र को संतुलित करता है।
* *लाभ:* मानसिक शांति, एकाग्रता और ऊर्जा प्रवाह में संतुलन।
* *भाव:* “मैं संतुलन में हूँ, दिव्य से जुड़ा हूँ।”
2. *भ्रामरी प्राणायाम (Bhramari – Bee Breath)*
* मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है, ध्यान को गहराई देता है।
*लाभ तनाव दूर करता है, ध्यान के लिए मन तैयार करता है।
*भाव: “मेरे भीतर ईश्वर की ध्वनि गूंज रही है।”
3. शीतली / शीतकारी प्राणायाम
* शरीर और मन को शीतल बनाता है, ध्यान की अवस्था में सहायक।
*भाव:“मैं शांति हूँ, मैं प्रकाश हूँ।”
🕉 ध्यान और बीज मंत्र
*बीज मंत्र “ॐ (Om)” — यह सभी चक्रों का, विशेषकर सहस्रार का मुख्य मंत्र है।
* *ध्यान:*
सिर के ऊपर एक चमकदार *सफेद या बैंगनी कमल* की कल्पना करें जिसमें हजार पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
ऊपर से एक *सफेद प्रकाश* नीचे उतरकर पूरे शरीर में फैल रहा है — “मैं ब्रह्म हूँ”, “मैं सम्पूर्णता हूँ” का भाव रखें।
🌸 सहायक अभ्यास
* प्रातःकाल या सूर्योदय के समय ध्यान करना।
* मौन साधना या जप साधना।
* प्रकृति में समय बिताना (विशेषकर खुले आकाश के नीचे)।
